खेलने लगे जुआ तो घरेलू कलह भी धड़ल्ले से शुरू
बड़े सट्टेबाजों की पौ-बारह तो छोटे खिलाड़ी भी नहीं पीछे
ए अहमद सौदागर लखनऊ। वैसे तो शहरी क्षेत्र से लेकर ग्रामीण इलाकों में जुओं की फड़ तो हमेशा सजी रहती और पुलिस धरपकड़ भी करती है, लेकिन दीपावली पर्व करीब आते ही बड़े सट्टेबाजों से लेकर छुटभईए जुआ के खिलाड़ी तरह-तरह के हथकंडे अपना कर जुआ खेलने के लिए उनकी बेताबी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। कुछ लोग यह मानकर हार-जीत की बाजी लगाकर जुआ खेलते हैं कि यह दिन शगुन का होता है। वहीं घर के लोगों की नींद इसलिए उड़ जाती है जब हारने के बाद घर में कलह होने लगती है। नतीजतन इसी दौरान मानो शगुन के नाम पर लाखों के वारे-न्यारे हो जाते हैं।
गौर करें तो इस अवैध खेल के शौकीनों की जुआ खेलने के लिए बेताबी का नतीजा होता है कि कभी-कभार घरों के भीतर ऐसी कलह पैदा होती है कि जुआ खेलने वाले खिलाड़ी हारने के बाद एक-दूसरे के लिए दुश्मन बन जाते हैं और हालात यहां तक पहुंच जाते हैं कि मना करने पर अपने ही लोगों का खून बहाने पर अमादा हो जाते हैं।
कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इन कथित जुए की फड़ों पर प्रतिदिन लाखों हजारों रुपए का दाव लगाया जाता है और एक दिन में करीब एक लाख रुपए तक के लेन-देन की चर्चा है। हालांकि इस इस रकम की पूरी तरह से पुष्टि नहीं होती, लेकिन आंकड़े कुछ इसी तरह के बयां करते हैं। खासकर जैसे ही दीपावली पर्व करीब आते हैं तो शहरी क्षेत्र से लेकर ग्रामीण इलाकों में जुआ खेलने वाले शौकीनों की फड़ जगह-जगह सज जाती है और इस दौरान शगुन के नाम पर लाखों के वारे-न्यारे भी हो जाते हैं। आर्थिक नुकसान के साथ परिवारों में विवाद के हालात होने की आंशका भी बनी रहती है। हालांकि इस दौरान पुलिस सक्रिय होती है, लेकिन ऊंची रसूख रखने वाले सट्टेबाजों के आगे घुटने टेक कर रह जाती है। साफ है इस पर्व के मौके पर एक से बढ़कर एक खिलाड़ी जुए की फड़ों पर पहुंचते हैं, जिनकी गर्दन दबोचने के लिए खाकी वर्दी वालों के लिए आसान नहीं होती।





