लखनऊ। ‘अभिनव प्रभात’ डेस्क 14 अप्रैल का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस आधार स्तंभ का स्मरण दिवस है, जिस पर आज हम गर्व के साथ खड़े हैं। भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हमें जो संविधान दिया, उसने सदियों से शोषित और वंचित समाज को न केवल अधिकार दिए, बल्कि उन्हें ‘गरिमापूर्ण जीवन’ जीने का साहस भी दिया।
आज जब हम बाबा साहब की जयंती मना रहे हैं, तो ‘अभिनव प्रभात’ के माध्यम से हम अपने पाठकों से यह सवाल जरूर करना चाहते हैं—क्या हमने उनके दिखाए ‘शिक्षा, संगठित हो और संघर्ष करो’ के मार्ग को आत्मसात किया है?
हमारे ग्रामीण अंचलों में आज भी कई ऐसी बुनियादी समस्याएं हैं जहाँ संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रति जागरूकता का अभाव है। सड़कें, शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासनिक लापरवाही जैसे मुद्दे आज भी हमारे सामने चुनौती बनकर खड़े हैं।
बाबा साहब के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि केवल माल्यार्पण या शोभा यात्रा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमारी असली श्रद्धांजलि तब होगी, जब हम अपने समाज में शिक्षा का दीप जलाएंगे, कमजोर वर्ग की आवाज बनेंगे और अन्याय के खिलाफ संवैधानिक तरीके से संघर्ष करेंगे।
‘अभिनव प्रभात’ हमेशा से ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की आवाज को मुख्यधारा में लाने के लिए प्रतिबद्ध है। आइए, इस 14 अप्रैल को हम यह संकल्प लें कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहेंगे और एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जहाँ समानता और न्याय केवल किताबों तक सीमित न रहकर जीवन का हिस्सा हों।
—वीरेंद्र कुमार, संपादक, अभिनव प्रभात





