April 22, 2026 2:50 pm

लोकतंत्र की असली बुनियाद और ग्रामीण पत्रकारिता का संघर्ष

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मजबूती का पैमाना राजधानी के वातानुकूलित कक्षों में बैठकर तय नहीं किया जा सकता। पत्रकारिता की असली परीक्षा और उसकी शक्ति का अहसास गांव की उन पगडंडियों और धूल भरी तहसीलों में होता है, जहाँ एक पत्रकार संसाधनों के अभाव के बावजूद ‘सच’ को जीवित रखने का जोखिम उठाता है। आज समय आ गया है कि हम उस ग्रामीण पत्रकारिता के अस्तित्व और गरिमा पर बात करें, जो व्यवस्था की अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति की आवाज बनती है।

तहसील और ब्लॉक स्तर के रिपोर्टर ही वह सेतु हैं, जो शासन की योजनाओं और जनता की उम्मीदों को जोड़ते हैं। जब सरकारी फाइलें धरातल पर दम तोड़ती हैं या सुदूर क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती हैं, तो उसे बेनकाब करने वाला सबसे पहला व्यक्ति ब्लॉक स्तर का पत्रकार ही होता है। इन ‘ग्राउंड रिपोर्टर्स’ के पास न तो बड़ी गाड़ियां हैं और न ही सुरक्षा का तामझाम, फिर भी वे अपनी कलम की धार से सत्ता की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा “अच्छे पत्रकारों को मान्यता प्राप्त आईडी कार्ड” देने की पहल सराहनीय है। किंतु, यहाँ एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है— ‘अच्छे पत्रकार’ की परिभाषा क्या है? क्या केवल जिला मुख्यालयों और राजधानियों में बैठने वाले पत्रकार ही इस श्रेणी में आते हैं?

वर्तमान व्यवस्था में ‘मान्यता’ (Accreditation) का जो ढांचा है, वह तहसील और ब्लॉक स्तर के कर्मठ पत्रकारों को एक बड़े शून्य में छोड़ देता है। यह विडंबना ही है कि जो पत्रकार सबसे ज्यादा जोखिम उठाकर खबरें लाता है, वह सरकारी लाभों और सुरक्षा के वैधानिक कवच से सबसे दूर है।

यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश की कल्पना को साकार करना चाहती है, तो उसे उन ‘आंखों’ और ‘कानों’ को सशक्त करना होगा जो सीधे जमीन से जुड़े हैं। हमारी मांगें स्पष्ट और न्यायसंगत हैं:

मान्यता का विकेंद्रीकरण: ब्लॉक और तहसील स्तर पर सक्रिय पत्रकारों के लिए एक पारदर्शी और विधिवत प्रक्रिया के तहत सरकारी मान्यता का प्रावधान हो।

समान सुरक्षा और लाभ: स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन में छूट और अन्य सरकारी लाभों का विस्तार ग्रामीण पत्रकारों तक भी किया जाए।

वैधानिक सुरक्षा कवच: धरातल पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को अक्सर स्थानीय दबंगों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ता है। सरकारी मान्यता न केवल उनकी पहचान है, बल्कि उनके सुरक्षा की गारंटी भी है।

ब्लॉक और तहसील स्तर के रिपोर्टर्स को मान्यता देना केवल एक कार्ड जारी करना नहीं है, बल्कि उनकी निष्ठा, साहस और जन-सरोकार के प्रति उनके समर्पण को राजकीय सम्मान देना है। अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण पत्रकारिता के इन “अदृश्य सेनानियों” को उनका वाजिब हक और पहचान दे। जब तक लोकतंत्र की नींव (ग्रामीण पत्रकार) मजबूत नहीं होगी, तब तक सुशासन का महल बुलंद नहीं रह सकता।

लेखक: रोहित कुमार कनौजिया (पत्रकार)

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