लखनऊ। (संवाददाता) चिकित्सा जगत में आज उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक क्रांतिकारी शुरुआत हुई है। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS) के प्रसिद्ध बाल हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. पीयूष उपाध्याय ने तीन वर्षों के कड़े शोध के बाद भारत का पहला AI-आधारित मोबाइल एप्लिकेशन “लिवर पूप” (LiverPoop) विकसित किया है।
इस ऐप का औपचारिक उद्घाटन संस्थान के निदेशक प्रो. डॉ. सी.एम. सिंह द्वारा अन्य वरिष्ठ संकाय सदस्यों की उपस्थिति में किया गया। यह ऐप न केवल नवजात शिशुओं की जान बचाएगा, बल्कि सरकारी खजाने के ₹290 करोड़ से अधिक की बचत भी करेगा।
क्या है ‘लिवर पूप’ ऐप और यह क्यों है खास?
यह एप्लिकेशन नवजात शिशुओं (0–1 वर्ष) में होने वाली ‘बिलीरी एट्रेसिया’ नामक जानलेवा बीमारी की समय पर पहचान करता है। इस बीमारी में पित्त की नली बंद हो जाती है, जिससे लीवर तेजी से खराब होने लगता है।
100% सटीक (Sensitivity): अध्ययनों में इस ऐप के परिणाम शत-प्रतिशत सटीक पाए गए हैं।
समय की अहमियत: यदि बीमारी का पता 60 दिनों के भीतर चल जाए, तो एक सामान्य सर्जरी (कसाई सर्जरी) से बच्चा ठीक हो सकता है। 90 दिनों के बाद केवल महंगा लीवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है।
पूर्णतः निशुल्क: यह ऐप आम जनता और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध है।
डिजिटल इंडिया की वैश्विक गूंज (40 भाषाएं)
यह ऐप केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में बदलाव लाने की क्षमता रखता है:
भाषाएं: इसमें 18 भारतीय और 22 विदेशी भाषाओं (जैसे अरबी, स्पेनिश, फ्रेंच, चीनी, जापानी) का सपोर्ट दिया गया है।
वैश्विक पहुंच: इसका लाभ SAARC, ASEAN और अफ्रीकी देशों के साथ-साथ विदेशों में रह रहे प्रवासी श्रमिक भी उठा सकेंगे।
आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए वरदान
डॉ. पीयूष उपाध्याय के अनुसार, यह ऐप राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत काम करने वाली आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाएगा। अब उन्हें महंगे और पुराने ‘पेपर स्टूल चार्ट’ की जरूरत नहीं होगी। बस मल (Poo) की फोटो लेकर ऐप पर टैप करना है, और AI तुरंत बता देगा कि स्थिति “सामान्य” है या “खतरे का संकेत”।
“हमारा उद्देश्य इस बीमारी को जन्म के तुरंत बाद पहचानना है। भारत को अब पेपर चार्ट पर करोड़ों खर्च करने की जरूरत नहीं है, AI आधारित यह ऐप ही भविष्य है।” — डॉ. पीयूष उपाध्याय
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान होने से लीवर ट्रांसप्लांट के मामलों में 20% तक की कमी आएगी, जिससे गरीब परिवारों और सरकार पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ काफी कम होगा। उद्घाटन के इस अवसर पर डॉ. विक्रम सिंह, डॉ. अरविंद कुमार सिंह और डॉ. दीप्ति अग्रवाल सहित संस्थान के कई अन्य दिग्गज मौजूद रहे।





