लखनऊ। (संवाददाता) क्योर ब्लाइंडनेस प्रोजेक्ट और सीतापुर आंख अस्पताल ने राजधानी लखनऊ में आयोजित विशेष कार्यशाला में अपने अंधत्व रोकथाम कार्यक्रम पर आधारित निवेश पर सामाजिक प्रतिफल (Social Return on Investment – SROI) अध्ययन के नतीजे साझा किए। डेलॉइट द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि कार्यक्रम में किए गए हर ₹88 (लगभग 1 अमेरिकी डॉलर) के निवेश पर समाज को लगभग ₹642 (लगभग 7.3 अमेरिकी डॉलर) का प्रतिफल मिला। यह लाभ आंखों की रोशनी बचाने, परिवार की आय सुरक्षित रखने और मरीजों के जल्दी काम पर लौटने से जुड़ा है।
डेलॉइट ने OECD-DAC के मानदंडों के आधार पर कार्यक्रम की प्रभावशीलता, दक्षता, सामाजिक प्रभाव और दीर्घकालिक स्थायित्व का मूल्यांकन किया। अध्ययन में सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित आशा कार्यकर्ताओं ने आंखों की सामान्य समस्याओं की पहचान और प्राथमिक उपचार कर 97% मामलों का समाधान गांव स्तर पर ही किया। 55,136 कॉर्नियल एब्रेशन के मरीजों का स्थानीय स्तर पर उपचार किया गया, जबकि 36,614 गंभीर मामलों को सीतापुर अस्पताल रेफर किया गया। इससे न सिर्फ उपचार की सुविधा लोगों के करीब पहुंची, बल्कि 41% कमाई करने वाले मरीज जल्दी काम पर लौट सके और परिवारों की आय पर असर नहीं पड़ा।
पूर्व DGHS डॉ. प्रमिला गुप्ता ने कहा कि यह पहल साबित करती है कि समुदाय स्तर पर प्राथमिकता देने से नेत्र स्वास्थ्य में बड़ा बदलाव संभव है। 97% मामलों का स्थानीय समाधान इस मॉडल की सफलता है। वहीं, राज्य कार्यक्रम अधिकारी NPCBVI डॉ. पंकज सक्सेना ने इसे विकास का प्रश्न बताते हुए कहा कि अंधत्व रोकथाम केवल चिकित्सा हस्तक्षेप नहीं है, बल्कि यह मॉडल स्थानीय स्वास्थ्य प्रणाली को भी स्थायी रूप से मजबूत बना रहा है।
ग्लोबल प्राइमरी केयर की निदेशक शैफाली शर्मा ने कहा कि *नेत्र स्वास्थ्य में निवेश मानव और आर्थिक विकास में निवेश है। अब आवश्यकता है कि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए।
अध्ययन यह संदेश देता है कि जब अस्पताल, सरकार और सामुदायिक कार्यकर्ता मिलकर काम करते हैं तो स्वास्थ्य कार्यक्रम केवल इलाज तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सशक्त साधन बन जाते हैं।




