August 8, 2026 2:16 am

​लोकतंत्र का चौथा स्तंभ: सबकी आवाज उठाने वाले खुद क्यों हैं बेआवाज?

“पत्रकार सबकी आवाज उठाते हैं, लेकिन उनकी आवाज कोई नहीं उठाता।” पत्रकार रोहित कुमार कनौजिया का यह कथन मात्र एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य की एक कड़वी सच्चाई है। जिस पत्रकार को हम लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहते हैं, वह आज खुद एक ऐसी ढहती हुई इमारत की तरह खड़ा है, जिसकी दरारें तो सबको दिखती हैं, लेकिन उसे थामने के लिए कोई हाथ आगे नहीं बढ़ता।

समाज का दर्पण, व्यवस्था का कोपभाजन

समाज में जब भी कहीं अन्याय होता है, किसी गरीब का हक मारा जाता है या सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार की बू आती है, तो दुनिया एक पत्रकार की ओर उम्मीद से देखती है। वह अपनी जान जोखिम में डालकर सच सामने लाता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जब वही पत्रकार अपनी सुरक्षा, वेतन विसंगतियों या कार्यस्थल पर होने वाले उत्पीड़न के लिए गुहार लगाता है, तो पूरा तंत्र और यहाँ तक कि वह समाज भी मौन साध लेता है जिसके लिए उसने लड़ाई लड़ी थी।

चुनौतियों का चक्रव्यूह

आज के दौर में पत्रकारों के सामने चुनौतियां बहुआयामी हो चुकी हैं:

सुरक्षा का अभाव: ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों पर हमले अब आम बात हो गई है। सच लिखने पर कभी दबंगों की लाठियां तो कभी कानूनी शिकंजों का सामना करना पड़ता है। विशेषकर क्षेत्रीय पत्रकारों के लिए खतरा और भी अधिक है।

आर्थिक असुरक्षा: चंद बड़े चेहरों को छोड़ दें, तो क्षेत्रीय और डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों की आर्थिक स्थिति दयनीय है। ‘छंटनी’ की तलवार हमेशा उनके सिर पर लटकी रहती है, जिससे मानसिक दबाव और बढ़ जाता है।

संस्थागत उपेक्षा: मीडिया संस्थान खुद भी अपने कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने में विफल रहे हैं। पत्रकारिता अब एक ‘मिशन’ के बजाय ‘कॉर्पोरेट बिजनेस’ बनती जा रही है, जहाँ एक कर्मचारी की आवाज मुनाफे के शोर में कहीं दब जाती है।

स्वतंत्र प्रेस: लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त

रोहित कुमार कनौजिया की यह चिंता जायज है क्योंकि यदि पत्रकार की आवाज दब गई, तो आम आदमी की आवाज को मंच मिलना बंद हो जाएगा। एक डरा हुआ या मजबूर पत्रकार कभी भी निष्पक्ष रिपोर्टिंग नहीं कर सकता। पत्रकार की आवाज उठाना किसी एक व्यक्ति का समर्थन करना नहीं, बल्कि उस ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ की रक्षा करना है, जो किसी भी जीवित लोकतंत्र की नींव होती है।

वक्त की मांग: सुरक्षा और सम्मान

समय आ गया है कि समाज और सरकार दोनों इस दिशा में संवेदनशीलता दिखाएं। पत्रकारों के लिए ‘जर्नलिस्ट प्रोटेक्शन एक्ट’ (पत्रकार सुरक्षा कानून) को सख्ती से लागू करने और उनके लिए न्यूनतम सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है।

याद रखिए, जब सच लिखने वाली कलम टूटती है, तो उसका नुकसान सिर्फ एक पत्रकार को नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को होता है। हमें उस आवाज का साथ देना होगा, जो हमारी आवाज बनती है।

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