August 8, 2026 2:10 am

संवेदनाओं का समाज

समाज की हर धड़कन में एक कहानी बसती है,
कहीं स्नेह की मधुर मुस्कान, कहीं पीड़ा हँसती है।
रिश्तों की डोर जब स्वार्थ के बंधनों में उलझ जाती है,
मानवता की उजली किरण भी धुंधली सी पड़ जाती है।
कभी विश्वास ही जीवन का मजबूत आधार था,
हर हृदय में प्रेम, अपनापन और सत्कार था।
बिना किसी अपेक्षा के रिश्ते निभाए जाते थे,
दुख-सुख के हर पल में अपने साथ खड़े नज़र आते थे।
पर समय के साथ कुछ दृश्य बदल से गए हैं,
भावनाओं के पावन स्वर कहीं मद्धम से हुए हैं।
कहीं रिश्ते व्यापार बने, कहीं स्वार्थ की दीवार बनी,
पवित्रता की छाया पर भी प्रश्नों की बौछार बनी।
यह नहीं कि हर चेहरा कठोर या बेगाना है,
आज भी मानवता का दीप कई दिलों में सुहाना है।
पर सच यह भी है कि संवेदनाएँ कमजोर हुई हैं,
मनुष्यता की राहें कहीं-कहीं चितचोर हुई हैं।
आओ फिर से प्रेम और विश्वास का दीप जलाएँ,
टूटते रिश्तों को अपनेपन की डोर से सजाएँ।
ऐसा समाज बनाएँ जहाँ मानवता मुस्काए,
इंसान, इंसान को दिल से समझे और अपनाए।
यही सच्चे समाज की पहचान बने,
हर हृदय में प्रेम और सम्मान बने।

~नंदिनी बरनवाल

63
Default choosing

Did you like our plugin?

error: Content is protected !!