August 8, 2026 4:50 am

बहुत पुराना चलन है किडनी का गोरखधंधा, कानपुर से पहले लखनऊ में भी पकड़ा जा चुका है गिरोह 

डॉ.अफजल सहित पांच डॉक्टरों की हुई गिरफ्तारी ने एक बार फिर पुराने जख्मों को किया ताजा 

 

ए अहमद सौदागर लखनऊ। खून का धंधा हो या फिर किडनी का गोरखधंधा। यूपी में इसकी चलन बहुत पुरानी है, चंद रुपयों के खातिर ईमान को बेचने वाले जमीनी कहे जाने वाले भगवान भी इस गोरखधंधे में कदम बढ़ा दिया है। कानपुर पुलिस ने मंगलवार को अंगों के सौदागरों को पकड़ा तो पता चला कि इस रैकेट में एक-दो नहीं बल्कि चालीस से अधिक लोग शामिल हैं।

इस गोरखधंधे की पोल उस समय खुली जब बिहार के समस्तीपुर निवासी एमबीए के छात्र आयुष ने अधुरी रकम मिलने इसकी सूचना पुलिस को दी। बताया जा रहा है कि आर्थिक तंगी से जूझ रहे आयुष ने अपनी एक किडनी दस लाख रुपए में बेचने का सौदा किया था, अंग के सौदागरों ने अधुरी रकम देकर टालमटोल कर दिया और मुजफ्फरनगर की एक मरीज पारूल तोमर के परिवार से साठ लाख रुपए ऐंठ लिए थे, जिसे किडनी की सख्त जरूरत थी। इस गोरखधंधे का भंडाफोड़ कर पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम कल्याणपुर क्षेत्र स्थित तीन अस्पतालों में छापेमारी कर आहूजा अस्पताल के मालिक डॉ सुरजीत सिंह आहूजा, उसकी पत्नी डॉ प्रीति आहूजा, डॉ राजेश कुमार, डॉ राम प्रकाश, डॉ नरेन्द्र सिंह व शिवम अग्रवाल को गिरफ्तार किया, जबकि इस गोरखधंधे में लिप्त चार डॉक्टर और भी शामिल हैं, जिनकी तलाश जारी है।

यह तो कानपुर जिले के कल्याणपुर क्षेत्र में अंगों के सौदागरों का मामला है अब चलें राजधानी लखनऊ की ओर यहां पर होटल में बैठकर किडनी का मास्टरमाइंड गिरोह चला रहा था।

हरिशंकर मौर्या, विनोद दुबे, पीजीआई कर्मी महबूब अली और कमिश्नर कार्यालय के लिपिक अशोक पाण्डे। ये सभी आरोपी किडनी बेचने वाले के प्यादे थे। गिरोह का सरगना एवं मास्टरमाइंड बिहार निवासी संतोष राय जो महंगे होटलों में बैठकर गिरोह संचालित कर रहा था।

गौर करें तो वर्ष 2012 में आशियाना पुलिस ने वृन्दावन कालोनी निवासी हरिशंकर मौर्या को पकड़ा तो उसने खुद को गिरोह का सरगना बताया था। पुलिस ने उसकी बात पर भरोसा किया और मामले की गहनता से तफ्तीश शुरू की पता चला कि यह तो हल्का-फुल्का गिरोह नहीं बल्कि बहुत बड़ा है इस गिरोह का तार राजधानी लखनऊ के प्रतिष्ठित अस्पतालों से लेकर कमिश्नर कार्यालय तक जुड़ा हुआ है। कमिश्नर कार्यालय में कार्यरत एक लिपिक जहां जाली एनओसी के मामले में कुछ साल पहले सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। खास बात यह है इसी कार्यालय में कार्यरत एक कर्मचारी की सतर्कता से पुलिस को किडनी बेचने वाले गिरोह तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की थी। सवाल है कि किडनी बेचने वाले गिरोहों का आतंक आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से चला आ रहा है।

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