हाईसिक्योरिटी जोन में दीवान रामलाल व छात्रा की हुई हत्या का मामला
ए अहमद सौदागर लखनऊ। बीस दिसंबर 2010- मुख्यमंत्री आवास के पास दीवान रामलाल की हत्या कर बदमाशों ने सरकारी कार्बाइन लूट कर भाग निकले। पुलिस ने घटना के दूसरे दिन आजमगढ़ निवासी चार नामजद आरोपियों को पकड़ कर सलाखों के पीछे भेजा, लेकिन लूटी गई कार्बाइन अभी तक बरामद नहीं कर सकी। पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद ऐसी कहानी गढ़ी कि लूटा गया सरकारी असलहा अपराधियों के गिरोह के सरगना को दे दिया गया। अगर ऐसा था तो नामजद आरोपियों ने अपने लीडर का नाम क्यों नहीं उजागर किया। गिरोह का सरगना कौन था और कहां का था इसका जवाब फिलहाल अभी तक पुलिस के पास नहीं है।
15 फरवरी 2016- जानकीपुरम से लापता हुई 12वीं की छात्रा की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई। उसका शव मुख्यमंत्री और पुराने पुलिस मुख्यालय के बीच जंगल में पड़ा मिला था। इस सनसनीखेज मामले का राजफाश कर पुलिस ने कातिलों को सलाखों के पीछे भेजा, लेकिन मृतका छात्रा की साइकिल व स्कूली बैग आज तक बरामद नहीं हो सका।
यह दो सनसनीखेज मामले गवाह हैं कि किस तरह पुलिस आनन-फानन में घटनाओं का राजफाश कर अपनी पीठ थपथपाई। गौर करें तो पुलिस की कहानी में हर बार कई ऐसे पेंच रह जाते हैं, जिनके सवालों का जवाब जिम्मेदार अफसरों के पास नहीं। मसलन इन घटनाओं में हत्यारों को पकड़ने में कामयाबी हासिल तो की, लेकिन गायब हुए सामान की बरामदगी चुनौती है। पुलिस की सक्रियता पर नजर डालें तो दीवान रामलाल हत्या कांड में लूटी गई सरकारी कार्बाइन व मृतका छात्रा की साइकिल व स्कूली बैग आज तक बरामद नहीं कर सकी। खास बात यह है ये तो सनसनीखेज वारदात आम स्थानों पर नहीं बल्कि हाईसिक्योरिटी जोन में हुई थी।
इस मामले में जब भी किसी जिम्मेदार पुलिस के आलाधिकारी से सवाल किया गया तो बस वही रटा-रटाया जवाब मिला प्रयास जारी है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है इससे पहले भी कई संगीन मामले में पुलिस आज तक न तो कातिलों को खोज पाई और न ही लूटा गया सामान बरामद कर सकी। उदाहरण के तौर पर हसनगंज में हुए तिहरा हत्याकांड।




