राजधानी के बाद अब मेरठ जिले में सरकारी जीप से खींचकर सिपाहियों को भीड़ ने बेरहमी से पीटा
ए अहमद सौदागर लखनऊ। यूपी में लगातार पुलिस का इकबाल धराशाई हो रहा है, जबकि बेखौफ उपद्रवियों की सक्रियता बढ़ती जा रही है। सूबे का निजाम बदलने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब अपराधी हों या फिर आतंक का पर्याय बने उपद्रवियों की सक्रियता ढीली पड़ेगी, हुआ इसके ठीक उल्टा। दो दिनों के भीतर जिस तरह से मनबढ़ किस्म के लोगों ने पुलिस के जवानों पर कहर बनकर बरसे, इससे साफ है पुलिस महानिदेशक का फरमान इनके लिए मायने नहीं रखता। कहीं पर चेकिंग के दौरान तो कहीं पर हल्की टक्कर को लेकर भीड़ ने पुलिसकर्मियों को पीट-पीटकर लहुलुहान कर दिया। इसके बाद भी पुलिस के जिम्मेदार आला अधिकारी अपने मातहतों के प्रति संवेदनहीन बने नजर आ रहे हैं।
कानून पर भारी पड़ती भीड़
राजधानी लखनऊ के सरोजनीनगर क्षेत्र स्थित शहीद पथ पर ड्यूटी के दौरान यातायात आरक्षी को चेकिंग करना महंगा पड़ गया। तेज रफ्तार से आ रहे एक वाहन चालक ने सिपाही पर वाहन चढ़ाने की कोशिश तो किया ही विरोध करने पर गाली-गलौज करते मारपीट कर वर्दी तक फाड़ डाला। इस मामले में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी चालक को दबोच लिया, लेकिन इस घटना से साफ है बेखौफ मनबढ़ लोगों का मनोबल सातवें आसमान पर है।
यह तो लखनऊ के सरोजनीनगर थाना क्षेत्र का मामला है अब चलें जनपद मेरठ की ओर। सावन मास के मौके पर शिवभक्तों यानी कांवड़ियों का काफिला निकल रहा था और उनकी सुरक्षा में पुलिस के जवान मुस्तैद थे।
इसी दौरान कौन सी ऐसी पुलिसकर्मियों से गलती हुई कि कांवड़ियों का ग़ुस्सा फूट पड़ा और सरकारी जीप से खींचकर सिपाही अरविंद व दिनेश को पीट-पीटकर लहुलुहान कर दिया। दोनों पुलिसकर्मी बचाओ-बचाओ की आवाज लगाते रहे, लेकिन उनके ऊपर लाठियों की बरसात होने का सिलसिला थम नहीं रहा था। मेरठ जिले में हुई घटना की वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि जिन खाकी वर्दी वालों पर लोगों की सुरक्षा का जिम्मा हो, लेकिन वही वर्दीधारी आए दिन आक्रोशित भीड़ का शिकार बन रहे हैं।
दो सिपाहियों को गुस्साए लोगों ने भले मारपीट कर अपनी वाहवाही बटोरकर उनका कलेजा ठंडा हो गया, लेकिन इस खौफनाक फैसले ने कानून के लिए खतरे की घंटी बजा दी।
यह कोई नई घटना नहीं है। भीड़ तो हमेशा से उग्र और अनियंत्रित रही है। सिर्फ लखनऊ और जनपद मेरठ की ही घटना नहीं, आए दिन कहीं न कहीं भीड़ के कारनामे सुनाई दे रहे हैं। गौर करें तो चार अगस्त 2013- प्रतापगढ़ जिले डीजे रोकने शहर कोतवाल ने कुछ कहा तो भड़के कांवड़ियों ने जमकर बवाल किया और जोगापुर गांव के पास स्थित सीताराम धाम के सामने प्रयागराज – अयोध्या हाईवे पर जाम करने के दौरान पहुंचे कोतवाल को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और पुलिस कर्मियों की चीता मोबाइल की बाइक को आग के हवाले कर दिया।
घटना के बाद पुलिस अफसरों की नींद टूटती है और मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई भी करती है, लेकिन दो-चार दिनों बाद पूरी कवायद ठंडे बस्ते में चली जाती है। चूंकि भीड़ के निशाने पर समाज के अवांछित लोग होते हैं, इसलिए पुलिस भी कार्रवाई में संकोच करती है। लेकिन इससे संवैधानिक व्यवस्था कठघरे में खड़ी होती है। उग्र भीड़ और उसकी प्रतिक्रिया पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है। इस सवाल पर कोई एक जवाब नहीं है। समाज शास्त्री और मनोवैज्ञानिकों का अलग नजरिया है, जबकि पुलिस के अनुभवी इसे अलग नजरिए से देखते हैं। इस मामले में नाम न छापने की शर्त पर एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी का कहना है कि इतनी जल्दी किसी को उतावला नहीं होना चाहिए क्योंकि इसी समाज से पुलिस के जवान भी हैं और युवा भी लिहाजा कोई भी बवाल होता है तो वह सभी लोगों को कुछ साल पीछे धकेल देता है।




